जी हाँ इतिहास साक्षी है कहें हम प्राचीन इतिहास का उदहारण लें या वर्तमान में एक असफल देश घोषित होने के कगार पर खड़े पकिस्तान का हो या विश्व के सर्वोच्च शक्तिकेंद्र अमेरिका का हर जगह जन ,गण, मन और सरकारी जुमला अपरिवर्तित रहता है लेकिन मात्र एक शासक के बदलने से हे कदाचार की जगह सदाचार ,बेईमानी की जगह ईमानदारी व कुव्यवस्था की जगह सुव्यवस्था आ जाती है । यही क्रम विपरीत हो जाता है जब शासन सूत्र चरित्रभ्रस्त हाथों में चला जाता है ।
उपर्युक्त उदहारण से एक बात तो स्पष्ट है की मात्र एक शासक के बदलने से अगर साडी व्यवस्था का चरित्र बदल जाता है तो एक इंसान भी बदलाब की शुरुआत कर सकता है ,हमारा इतिहास में भी ऐसे अनेक उदहारण मिलते हैं .............लेकिन सभी उदहारण में एक बात समान है ऐसे इंसानों के सोचने का ढंग औरों से बहुत अलग होता है । तो अगर आपके पास नयी सोच है अगर आप औरों से अलग सोच सकते हो तो आप बदलाब की शुरुआत कर सकते हैं या संभव है आप बदलाब कर ही दें ।क्योंकी बदलाब एक सतत प्रक्रिया है इसलिए इसमें कितन समय लगेगा यह कोई नहीं बता सकता और क्योंकि बदलाब के लिए टिकाऊपन बहुत जरुरी है इसलिए ये बहुत जरुरी है की आप के विचार मजबूत हों और वो मुश्किल परिस्थतियों में न बदलें ।
लेकिन कैसे .............................................
जबाव देने से पहले एक स्पष्टीकरण आवश्यक है कि हर सिक्के के दो पहलू होते हैं । मनुष्य अच्छाई और बुरे के तालमेल से तैयार सत्ता है , स्वयं के लिए ईश्वर द्वारा वरदान स्वरुप प्राप्त बौद्धिक क्षमता व सुधारशक्ति के फलस्वरूप मनुष्य गुण व अवगुण के अनुपात को परिवर्तित करता है क्योंकि अच्छाई और बुरे के किसी भी छोर का अतिक्रमण करना न केवालात्यंत दुर्गम है अपितु मानव सामर्थ्य के बहार कि बात है और अगर कोई ऐसा कर पाता है तो वह या तो देवता है या राक्षस।
गुणावगुण के आधार पर हम मनुष्य को तीन कोटियों में विभाजित कर सकते हैं । प्रथम कोटि में वह लोग आते हैं जो संवेग चालित हैं,स्वार्थी होते हैं व अपनी स्वार्थ सिद्धि को किसी भी हद तक जा सकते हैं । धर्मं,समाज,नैतिकता का कोई नियम इन्हें नहीं बांध सकता।इन्हें अगर कोई बांध सकता है तो वह है जैविक नियम और जैविक नियम से संचालित होने वाला पशु होता है , अतः इनको "नरपशु" कहना ज्यादा उपयुक्त होगा ।पशुओं की तरह कुछ अच्छाईयाँ इनमे भी होती हैं,जिस कारण ये समाज के ऊँचे राष्होख के लोगों में पालित पोषित होते हैं,ठीक उसी तरह जैसे मनुष्यों को कुत्ते - बिल्लिओं को पालने,पुचकारने व अपने पास सुलाने में कोई संकोच नै होता । इनकी संख्या समाज में कम होती है जिसे हम 5% मान सकते हैं ।
दूसरी कोटि में आने वाले लोगों को हम अवसरवादी कह सकते हैं । सामान्य "ताप और दाब" पर यह वर्ग प्रतियेक नियम व कानून का हिमायती होता है और वह कानून का पालन करता भी है लेकिन "लक्ष्मी के ताप" और "यमराज रूपी दाब " में चेंज होने पर यह वर्ग नतमस्तक हो जाता है या हो जाना पड़ता है ।यदि इस वर्ग को भरोसा हो की रात के अँधेरे में इन्हें कोई नहीं देख रहा है तो यह "राजा के हौज़ " में पानी हे डालेंगे दूध कभी नहीं ।इसीलिए इस वर्ग को सन्मार्ग पर रखने के लिए सतत निगरानी की आवश्यकता होती है ।ऐसे मनुष्यों का सकारात्मक पहलू यह होता है की स्वयं फिसलन की राह पर होते हुए भी ये बेदाग़ चरित्र संपन्न नेतृत्व का प्रशंसक व पक्षधर होता है।इस वर्ग को हम आम आदमी कहते हैं "द कॉमन मैन"।
तृतीये कोटि में वह लोग आते हैं जो अपनी बुराइयों को स्वतः नियंत्रित करने में सक्षम होते हैं ।अच्छाई और बुराई का संघर्ष इनके भीतर भी होता है ,लेकिन इनमे जीत हमेशा अच्छाई की होती है । इन्हें सदाचारी कहा जाता है । हालाँकि चारित्रिक द्रष्टि से सोपानगत भेद की सम्भावना यहाँ भी रहती है लेकिन "निअरली राईट " के आधार पर इन सबको एक हे श्रेणी में रखा जा सकता है । यही लोग शासन करने के योग्य होते हैं इन्हें हे शासन सौंपा जान चाहिए, लेकिन मानवजाति के सौभाग्य से जहाँ समाज में नरपशुओं की संख्या सीमित होती है ,वाही दुर्भाग्य से सच्चरित्र लोगों की संख्या भी इसी दायरे के आस-पास है ।जब स्थितियों की विषमता के मद्देनज़र समाज की बागडोर तृतीये कोटि वाले हांथों से फिसलने लगती है तो उसे संभालने के लिए द्वितीये कोटिक लोगों या नरपशुओं का सहयोग अनिवार्य और संख्या बहुमत हो जाती है ।
"वर्तमान भारतीय राजनीति का सन्दर्भ इसी स्थति में जकड़ा हुआ है "।
ऐसा क्यूँ हुआ यह एक गहन सामाजिक विश्लेषण का परशान है जो न तो इस छोटे से लेख में संभव है और न आपेक्षित ,लेकिन जो हो चुका है वह परिमाण और परिणाम दोनों ही द्रष्टियों से चिंताजनक है । आज भरतीयों का ईमानदारी सार्थकता और ईमानदारों की वास्तविकता से भरोसा उठ गया है । जिन लोगों को सच्चरित्र होना चाहिए वह नरपशुओं को निरंतर सफलता की सीढियां चढ़ते देख अपने को कोस रहे हैं । आज स्त्थिति की भयानकता कल्पना न रहकर मूर्त रूप ले चुकी है , जिसका कही भी कभी भी साक्षात्कार किया जा सकता है।
गुणावगुण के आधार पर हम मनुष्य को तीन कोटियों में विभाजित कर सकते हैं । प्रथम कोटि में वह लोग आते हैं जो संवेग चालित हैं,स्वार्थी होते हैं व अपनी स्वार्थ सिद्धि को किसी भी हद तक जा सकते हैं । धर्मं,समाज,नैतिकता का कोई नियम इन्हें नहीं बांध सकता।इन्हें अगर कोई बांध सकता है तो वह है जैविक नियम और जैविक नियम से संचालित होने वाला पशु होता है , अतः इनको "नरपशु" कहना ज्यादा उपयुक्त होगा ।पशुओं की तरह कुछ अच्छाईयाँ इनमे भी होती हैं,जिस कारण ये समाज के ऊँचे राष्होख के लोगों में पालित पोषित होते हैं,ठीक उसी तरह जैसे मनुष्यों को कुत्ते - बिल्लिओं को पालने,पुचकारने व अपने पास सुलाने में कोई संकोच नै होता । इनकी संख्या समाज में कम होती है जिसे हम 5% मान सकते हैं ।
दूसरी कोटि में आने वाले लोगों को हम अवसरवादी कह सकते हैं । सामान्य "ताप और दाब" पर यह वर्ग प्रतियेक नियम व कानून का हिमायती होता है और वह कानून का पालन करता भी है लेकिन "लक्ष्मी के ताप" और "यमराज रूपी दाब " में चेंज होने पर यह वर्ग नतमस्तक हो जाता है या हो जाना पड़ता है ।यदि इस वर्ग को भरोसा हो की रात के अँधेरे में इन्हें कोई नहीं देख रहा है तो यह "राजा के हौज़ " में पानी हे डालेंगे दूध कभी नहीं ।इसीलिए इस वर्ग को सन्मार्ग पर रखने के लिए सतत निगरानी की आवश्यकता होती है ।ऐसे मनुष्यों का सकारात्मक पहलू यह होता है की स्वयं फिसलन की राह पर होते हुए भी ये बेदाग़ चरित्र संपन्न नेतृत्व का प्रशंसक व पक्षधर होता है।इस वर्ग को हम आम आदमी कहते हैं "द कॉमन मैन"।
तृतीये कोटि में वह लोग आते हैं जो अपनी बुराइयों को स्वतः नियंत्रित करने में सक्षम होते हैं ।अच्छाई और बुराई का संघर्ष इनके भीतर भी होता है ,लेकिन इनमे जीत हमेशा अच्छाई की होती है । इन्हें सदाचारी कहा जाता है । हालाँकि चारित्रिक द्रष्टि से सोपानगत भेद की सम्भावना यहाँ भी रहती है लेकिन "निअरली राईट " के आधार पर इन सबको एक हे श्रेणी में रखा जा सकता है । यही लोग शासन करने के योग्य होते हैं इन्हें हे शासन सौंपा जान चाहिए, लेकिन मानवजाति के सौभाग्य से जहाँ समाज में नरपशुओं की संख्या सीमित होती है ,वाही दुर्भाग्य से सच्चरित्र लोगों की संख्या भी इसी दायरे के आस-पास है ।जब स्थितियों की विषमता के मद्देनज़र समाज की बागडोर तृतीये कोटि वाले हांथों से फिसलने लगती है तो उसे संभालने के लिए द्वितीये कोटिक लोगों या नरपशुओं का सहयोग अनिवार्य और संख्या बहुमत हो जाती है ।
"वर्तमान भारतीय राजनीति का सन्दर्भ इसी स्थति में जकड़ा हुआ है "।
ऐसा क्यूँ हुआ यह एक गहन सामाजिक विश्लेषण का परशान है जो न तो इस छोटे से लेख में संभव है और न आपेक्षित ,लेकिन जो हो चुका है वह परिमाण और परिणाम दोनों ही द्रष्टियों से चिंताजनक है । आज भरतीयों का ईमानदारी सार्थकता और ईमानदारों की वास्तविकता से भरोसा उठ गया है । जिन लोगों को सच्चरित्र होना चाहिए वह नरपशुओं को निरंतर सफलता की सीढियां चढ़ते देख अपने को कोस रहे हैं । आज स्त्थिति की भयानकता कल्पना न रहकर मूर्त रूप ले चुकी है , जिसका कही भी कभी भी साक्षात्कार किया जा सकता है।
राजनीतिक व सामाजिक सन्दर्भ में कैंसर बन चुके भ्रस्टाचार कस दर्द सबसे ज्यादा आम आदमी को हे महसूस होता है, कारण मनोवैज्ञानिक हैं : अभ्रस्ट वातावरण की दरकार इसे भी हैं और उन्हें भी जो तृतीयक कोटि में हैं ,अभ्रस्ट हैं अविकार्य हैं । लेकिन जहाँ तृतीये कोटि के लोग आधिक व अभ्रस्ट होते हैं अतः ये कैंसर की पीड़ा को सहने में सक्षम होते हैं वहीँ आम आदमी स्वभतः लचीला व आधीर होने के कारण दुखों के गहन अनभूति सहन नहीं कर पाता और बदलाब के लिए उर्वरा भूमि मुहैया करा देता है, यहीं से शासक का काम आसान हो जाता है और वो हमेशा इस आम आदमी को हे टार्गेट करता है जो की लचीला है , आधीर है, जल्द बहक जाता है । अव उसे इस गुण का उपयोग बुरे के लिए भी हो सकता है और अच्छाई के लिए भी, ये सिर्फ और सिर्फ शासक पर निर्भर करता है की वह उसका किस तरह से प्रयोग करता है.यहीं इस प्रशन का जवाब मिल जाता है की मात्र एक शासक के बदलने से संपूर्ण व्यवस्था का चरित्र क्यूँ बदल जाता है ।
कल न बदला तो आज बदलेगा, शर्तिया हर रिवाज़ बदलेगा,
आदमी की यहाँ तलाश करो, आदमी ही समाज बदलेगा ।
कल न बदला तो आज बदलेगा, शर्तिया हर रिवाज़ बदलेगा,
आदमी की यहाँ तलाश करो, आदमी ही समाज बदलेगा ।